एक घर ढूंढ रही थी रहने के लिए
पर जब से निकली हूं तुम्हारी कही हर बात याद आई है…
मैं तो अब भी उसी दुनिया में रहती हूं मां
जो तुमने बचपन की कहानियों में मेरे लिए बनाई है।
तुमने तो जीवन के कई रूप देख लिए
नए पुराने हर रिश्ते से ठोकर खाई है,
सबको फिर भी अपनाया है मां…
तुममें इतनी करुणा जाने कहां से आई है।
अपनी आवाज़ ऊंची करने की होड़ हो जहां, वहां चुप रह जाना हार नहीं,
अपमान का बदला अपशब्दों से लिया तो सिर्फ दूरी बढ़ेगी, प्यार नहीं।
जो मन को भाए न – उसे जाने दो, बुराई करने का हमें कोई अधिकार नहीं,
तुम्हारी समझाई हर बात आज ढाल है मेरी, कोई सीख थी बेकार नहीं।
इतनी सारी बातें सिखाईं, तो आज मेरी भी कुछ बात मान लो,
जितना सबको देती हो कभी खुदको भी उतना सम्मान दो।
कभी कभी न भी बोल दिया करो…
हर उस फरमाइश को जो मीठे बोलों में छुपकर आती है।
कभी बस यूंही मुझसे कह दिया करो…
हर वो बात जो मन को चुभकर रह जाती है।
कभी अपना सारा वक्त अपने आप को भी दे लेना मां…
तुम कहती हो जो है सब भाग्य का लेखा है,
पर कभी ख़ुद पर भी गर्व कर लेना मां…
तुम जैसा सरल और साहसी मैंने कम ही देखा है।
कोई और चाहे न हो, तुम हरदम रहती हो साथ…
ऐसी एक लकीर मैंने किस्मत से पाई है।
कभी खुदको अकेला पाओ तो बस इतना रखना याद,
मेरे लिए मेरा सब कुछ तुम हो मां…
तुम्हारी ये गुडिया तो तुम्हारी ही परछाईं है।
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Maa…
4 replies on “Maa…”
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nteract and grow together. A cordial greeting from the south of Spain 🫂 🇪🇸
Answer please 🙏
David López Moncada
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Hello David… It’s nice to meet you through your blog. I am sure we will learn and enjoy this community together. Thanks for your kind words .. 😇
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💚🫂 I grow together 💯
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Gracias a ti 🌈
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